उम्र बढ़ रही है मगर ज़िंदगी थमी हो जैसे,
होंठों पे हँसी और आँखों में नमी हो जैसे।
तन्हा ही रह गए हैं ज़िंदगी के सफ़र में हम,
हर मोड़ पे तेरी यादों की भीड़ जमी हो जैसे।
ज़िंदगी यूँ तो गर्दिश में रही मिलके तुमसे,
जुदा होके साँसों की रफ़्तार भी धीमी हो जैसे।
तुझसे बिछड़के ग़म तो है दिल को बहुत मगर,
जाने क्यूँ ग़म-ए-दिल में कोई कमी हो जैसे।
ये इश्क़ भी संगीन सी जंग निकला 'अर्श',
जीतकर भी हार जाना लाज़मी हो जैसे।
~योगेश 'अर्श'