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24 फ़रवरी, 2026

उम्र बढ़ रही है मगर ज़िंदगी थमी हो जैसे,

होंठों पे हँसी और आँखों में नमी हो जैसे।


तन्हा ही रह गए हैं ज़िंदगी के सफ़र में हम,

हर मोड़ पे तेरी यादों की भीड़ जमी हो जैसे।


ज़िंदगी यूँ तो गर्दिश में रही मिलके तुमसे,

जुदा होके साँसों की रफ़्तार भी धीमी हो जैसे।


तुझसे बिछड़के ग़म तो है दिल को बहुत मगर,

जाने क्यूँ ग़म-ए-दिल में कोई कमी हो जैसे।


ये इश्क़ भी संगीन सी जंग निकला 'अर्श',

जीतकर भी हार जाना लाज़मी हो जैसे।


~योगेश 'अर्श'


19 जून, 2017

मुझे उसकी, उसे मेरी कोई खबर नही
हमराह है वो मेरा मगर हमसफर नही

योगेश 'अर्श'

बारीश

नए मौसम की पहली बारिश हुई है आज
फिर उनसे मिलने की ख्वाहिश हुई है आज

यूँही कुरेदकर पुराने जख्मों को फिरसे
खुदको रुलाने की साजिश हुई हैं आज

ना नाम जुबां पे आया, ना आँख से आँसू बहे
यूँ भी मेरे इश्क़ की आजमाईश हुई है आज

दिलकी हसरतों को जाहिर जो किया हमने
तो खुलके नफरतों की नुमाईश हुई है आज

क्या क्या सोचा था की कहेंगे उनसे मगर
हमसे चुप रहने की गुजारिश हुई है आज

मेरे इश्कमे ज्यादा असर है या नफरतों में तेरी
फिरसे ये आजमाने की कोशिश हुई है आज

योगेश 'अर्श'

04 जून, 2011

बदनाम


रहते थे कभी दिलमें तेरे हम एक गुलफाम की तरह
बैठे हैं तेरी महफिल में आज हम किसी आम की तरह

मैं तुझे भुला ना पाऊँ शायद उम्रभर लेकिन
भुला दे तू मुझे, बिगडे हुए किसी काम की तरह

देख तेरे हाथ कही हो ना जाये घायल इनसे
ना उठा मेरे दिल के टुकडे, टुटे हुए जाम की तरह

जिंदगी का क्या हैं ये तो कट जायेगी युँ ही
आहिस्ता आहिस्ता, ढलती हुई शाम की तरह

मुझे याद करने से बस दर्द ही नसीब होगा तुझे
मिटा दे मेरी याद को, रेत पे लिखे नाम की तरह

ये सच हैं शायद के मैं तेरे काबिल ही नही हुँ
ठुकरा दे तू भी मुझे, झुठे किसी इल्जाम की तरह

संभाल के रक्खा हैं मैने बडी जतन से जिनको
मेरा हर गम हैं तेरे दिए हुए इनाम की तरह

तुने भी ना अपना कभी समझा मुझे भुलकर
ठुकराया हैं दुनियाने भी मुझे किसी नाकाम की तरह

तेरी महफिल से उठके जाता भी तो कहा ’अर्श’
मुँह छुपाये फिरता हैं अब किसी बदनाम की तरह


-योगेश ’अर्श’

10 सितंबर, 2009

इंतजार

युँ भी अपने दिलको खुश कर लेते हैं हम
बातें उनकी तस्वीर से ही कर लेते हैं हम

एक ना एक दिन वो आयेंगे मिलने हमसे
इसी उम्मीद पे इंतजार कर लेते हैं हम

हर वादा टुटा मेरे दिल की तरह फिर भी
हर वादे पे उनके यकीं कर लेते हैं हम

पता हैं हमें हासिल कुछ नहीं होगा लेकिन
कभी युँ ही खुदा से फर्याद कर लेते हैं हम

हर दर्द की दवा की जाये ये जरुरी तो नहीं
दर्द ही को जिंदगी की दवा कर लेते हैं हम

कई बातें हैं जिन्हें कहने नहीं पाती ये जुबाँ
उन बातों को अश्कों से बयाँ कर लेते हैं हम

अपनी जिंदगी में फुल कहा से आयेंगे भला
इसीलिये काँटोंसे ही दोस्ती कर लेते हैं हम

अब वो चाहे मिटा दे हमें या फिरसे बना दें
उन्हीं को इस दिल का खुदा कर लेते हैं हम

फिर जनम लेके हम फिर उन्हें चाहें ’अर्श’
मरने से पहले ये दुवा कर लेते हैं हम


-योगेश 'अर्श'

02 अगस्त, 2009

दोस्ती - Happy Friendship Day!!

दोस्तो,

कल Friendship Day था। इस मौके पर लिजीये एक गज़ल पेश कर रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आयेगी।

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दोस्त बनकर आये हो तुम जबसे मेरे जीवन में
हर तरफ हैं पायी मैंने खुशीयाँ अपने जीवन में

ये हँसता हुवा चेहरा मेरा, तेरी ही तो देन हैं दोस्त
यही खयाल आया जब भी देखा मैंने दर्पन में

तोहफा हैं अनमोल ये सबसे दोस्ती तेरी मेरे लिये
जीवनभर युँही बंधे रहना दोस्ती के इस बंधन में

ऐ दोस्त तेरे साथ रहकर मिलता हैं युँ सुकून मुझे
माँ की गोद में सोता हैं जैसे बच्चा कोई बचपन में

खुद ही एक गजल बना हैं जीवन मेरा तुमसे मिलकर
करता हुँ हर शेर मैं इसका आज तुम्हारी अर्पन में


-योगेश ’अर्श’

15 जुलाई, 2009

एक गज़ल हैं जैसे जिंदगी मेरी

दोस्तों,

आज जो शेर मैं आपके सामने पेश करने जा रहा हूँ वो मेरे अपने सबसे पसंदीदा शेरों में से एक हैं। जरा गौर फरमाईएगा...

एक गज़ल हैं जैसे जिंदगी मेरी
हर ग़म जैसे एक शेर
क्यूं ना खुबसूरत हो ये गज़ल
हर शेर में जीक्र तेरा जो हैं

इस शेर में शायर की कल्पना ये हैं की उसकी जो जिंदगी हैं उसमे कई सारे ग़म हैं। लेकिन उसे इन ग़मों के होने से जरा भी शिकायत नहीं हैं। उल्टा उसे इन ग़मों से प्यार ही हैं। और उसकी वजह ये हैं की उसका हर एक ग़म उस की मेहबूबा की ही देन हैं। उसका हर एक ग़म उसकी मेहबूबासे ही जुडा हुआ हैं। शायर की कल्पना की नजाकत देखिये। उसकी मेहबूबा ने उसका दिल तोड़ दिया है। वो अभी ग़मज़दा है। फिर भी उसे अपनी मेहबूबा से कोई शिकायत नहीं हैं। उसकी चाहत की ये हद हैं की उसकी मेहबूबा के दिए हुए ग़म से भी उसे प्यार ही हैं.

-योगेश 'अर्श'