24 फ़रवरी, 2026

उम्र बढ़ रही है मगर ज़िंदगी थमी हो जैसे,

होंठों पे हँसी और आँखों में नमी हो जैसे।


तन्हा ही रह गए हैं ज़िंदगी के सफ़र में हम,

हर मोड़ पे तेरी यादों की भीड़ जमी हो जैसे।


ज़िंदगी यूँ तो गर्दिश में रही मिलके तुमसे,

जुदा होके साँसों की रफ़्तार भी धीमी हो जैसे।


तुझसे बिछड़के ग़म तो है दिल को बहुत मगर,

जाने क्यूँ ग़म-ए-दिल में कोई कमी हो जैसे।


ये इश्क़ भी संगीन सी जंग निकला 'अर्श',

जीतकर भी हार जाना लाज़मी हो जैसे।


~योगेश 'अर्श'


22 मई, 2025

कोई एक ख्वाब था…

कोई एक ख्वाब था…

जो तेरी आँखों से गिरकर
मेरे दिल में समा गया।

रात भर वो
तारों से बातें करता रहा,
और मैं…
तेरे नाम की चुप्पी ओढ़े
मुस्कुराता रहा।

सुबह आयी
तो वो ख्वाब
सच बन जाने की ज़िद करने लगा।

अब तू ही बता—
मैं उसे कैसे मना करता?


~योगेश 'अर्श' 🌸 

27 सितंबर, 2017

ऐसा नहीं के तुझसे मुहोब्बत नहीं
युँ भी नहीं के तेरी जरुरत नहीं
लेकिन तेरी हर बात पे सर झुका दूं
मेरे दिल को इसकी आदत नहीं

~योगेश 'अर्श'

19 जून, 2017

मुझे उसकी, उसे मेरी कोई खबर नही
हमराह है वो मेरा मगर हमसफर नही

योगेश 'अर्श'

बारीश

नए मौसम की पहली बारिश हुई है आज
फिर उनसे मिलने की ख्वाहिश हुई है आज

यूँही कुरेदकर पुराने जख्मों को फिरसे
खुदको रुलाने की साजिश हुई हैं आज

ना नाम जुबां पे आया, ना आँख से आँसू बहे
यूँ भी मेरे इश्क़ की आजमाईश हुई है आज

दिलकी हसरतों को जाहिर जो किया हमने
तो खुलके नफरतों की नुमाईश हुई है आज

क्या क्या सोचा था की कहेंगे उनसे मगर
हमसे चुप रहने की गुजारिश हुई है आज

मेरे इश्कमे ज्यादा असर है या नफरतों में तेरी
फिरसे ये आजमाने की कोशिश हुई है आज

योगेश 'अर्श'

10 जून, 2011

दिल्लगी

ये दिल की लगी हैं, इसे दिल्लगी क्यूँ कहते हो
दिल के इतने करीब आकर भी, हमसे दूर क्यूँ रहते हो

-योगेश ’अर्श’

04 जून, 2011

बदनाम


रहते थे कभी दिलमें तेरे हम एक गुलफाम की तरह
बैठे हैं तेरी महफिल में आज हम किसी आम की तरह

मैं तुझे भुला ना पाऊँ शायद उम्रभर लेकिन
भुला दे तू मुझे, बिगडे हुए किसी काम की तरह

देख तेरे हाथ कही हो ना जाये घायल इनसे
ना उठा मेरे दिल के टुकडे, टुटे हुए जाम की तरह

जिंदगी का क्या हैं ये तो कट जायेगी युँ ही
आहिस्ता आहिस्ता, ढलती हुई शाम की तरह

मुझे याद करने से बस दर्द ही नसीब होगा तुझे
मिटा दे मेरी याद को, रेत पे लिखे नाम की तरह

ये सच हैं शायद के मैं तेरे काबिल ही नही हुँ
ठुकरा दे तू भी मुझे, झुठे किसी इल्जाम की तरह

संभाल के रक्खा हैं मैने बडी जतन से जिनको
मेरा हर गम हैं तेरे दिए हुए इनाम की तरह

तुने भी ना अपना कभी समझा मुझे भुलकर
ठुकराया हैं दुनियाने भी मुझे किसी नाकाम की तरह

तेरी महफिल से उठके जाता भी तो कहा ’अर्श’
मुँह छुपाये फिरता हैं अब किसी बदनाम की तरह


-योगेश ’अर्श’

15 अगस्त, 2010

वो भी हमसे प्यार करें, ये जरुरी तो नहीं
होके जुदा जी ना पाये, ऐसी मजबूरी तो नहीं
माना के प्यार जिंदगी की जरुरत हैं मगर
जरुरत ये कोई आखरी तो नहीं

--योगेश ’अर्श’

12 अगस्त, 2010

रातभर सर्द हवा चलती रही
तेरी फुर्कत ने रातभर रुलाया हमें
मोम होते तो कब के पिघल जाते
चरागोंसा तेरी याद ने जलाया हमें

--योगेश ’अर्श’

17 नवंबर, 2009

इस दीवाने दिल की हसरत क्या है...

इस दीवाने दिल की हसरत क्या हैं
हमें आपकी ऐसी जरुरत क्या हैं
कभी इस दिल में उतरकर देखिये जनाब
आखिर ये जज्बा-ए-मुहब्बत क्या हैं

-योगेश ’अर्श’

29 अक्टूबर, 2009

इस दिल की हर धडकन में तुम हो...

इस दिल की हर धडकन में तुम हो
मेरी हर साँस की सरगम में तुम हो
इस कदर समा गई हो तुम मुझमें
कि हर खुशी, और हर गम में तुम हो
 
-योगेश 'अर्श'

09 अक्टूबर, 2009

कितना हसीं ये एहसास है

कितना हसीं ये एहसास है
के तू मेरे दिल के पास है
तेरे ही नाम की हर धड़कन
तेरे ही नाम की हर सास है

-योगेश 'अर्श'

10 सितंबर, 2009

इंतजार

युँ भी अपने दिलको खुश कर लेते हैं हम
बातें उनकी तस्वीर से ही कर लेते हैं हम

एक ना एक दिन वो आयेंगे मिलने हमसे
इसी उम्मीद पे इंतजार कर लेते हैं हम

हर वादा टुटा मेरे दिल की तरह फिर भी
हर वादे पे उनके यकीं कर लेते हैं हम

पता हैं हमें हासिल कुछ नहीं होगा लेकिन
कभी युँ ही खुदा से फर्याद कर लेते हैं हम

हर दर्द की दवा की जाये ये जरुरी तो नहीं
दर्द ही को जिंदगी की दवा कर लेते हैं हम

कई बातें हैं जिन्हें कहने नहीं पाती ये जुबाँ
उन बातों को अश्कों से बयाँ कर लेते हैं हम

अपनी जिंदगी में फुल कहा से आयेंगे भला
इसीलिये काँटोंसे ही दोस्ती कर लेते हैं हम

अब वो चाहे मिटा दे हमें या फिरसे बना दें
उन्हीं को इस दिल का खुदा कर लेते हैं हम

फिर जनम लेके हम फिर उन्हें चाहें ’अर्श’
मरने से पहले ये दुवा कर लेते हैं हम


-योगेश 'अर्श'

26 अगस्त, 2009

ऐ काश के दिल हमारा पत्थर होता

ऐ काश के दिल हमारा पत्थर होता
किसी बात का ना इसपे असर होता

जी लेते एक जिंदा लाश की तर्हा फिर
जिंदगी का खौफ, ना मौत का डर होता

हँसकर पी लेते ये जहर का प्याला
पता तेरा इरादा हमें अगर होता

क़ातिल का पता चल जाता दुनिया को
जो लाश के पास मिला वो खंजर होता

हमसफर होता जहाँ में कोई मेरा
फिर आसान कुछ तो ये सफर होता

पा लेता प्यार इस दुनिया में किसीका
ना होता दुनिया में ’अर्श’ मगर होता


-योगेश 'अर्श'

11 अगस्त, 2009

फिर भी ये दिल दुआ तुझको देता हैं

दोस्तो, इस दुनिया में प्यार करनेवालों की कमी नहीं हैं। लेकिन सच्चे प्यार का मतलब कितने लोग जानते हैं ये एक सोचनेवाली बात हैं। ऐसे कई लोग हैं जो सिर्फ बाहरी आकर्षण को ही प्यार समझ बैठते हैं। और ऐसे भी हैं जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को ही प्यार का नाम दे देते हैं। लेकिन खुशी की बात ये हैं की आज भी दुनिया में ऐसे लोग हैं जो प्यार के लिये अपना सबकुछ लुटा सकते हैं। उनके लिये उनका प्यार ही उनका जीवन होता हैं। ऐसे इन्सान अगर प्यार में धोखा भी खाते हैं तो अपने मेहबूब से कोई शिकवा नहीं करते। उलटे उसके लिये भी दुवायें ही मांगते हैं। लिजीये आपके सामने पेश कर रहा हूँ एक ऐसा ही शेर जो प्यार में धोखा खाये हुए एक आशिक की इसी मानसिकता को दर्शाता हैं। उम्मीद करता हूँ की आपको मेरा ये शेर पसंद आयेगा।

जानता हूँ की लौटके अब तू आयेगी नहीं
फिर भी ये दिल सदा तुझको देता हैं
इस दिल का हर जख़्म तेरी ही बदौलत
फिर भी ये दिल दुआ तुझको देता हैं

-योगेश ’अर्श’

02 अगस्त, 2009

दोस्ती - Happy Friendship Day!!

दोस्तो,

कल Friendship Day था। इस मौके पर लिजीये एक गज़ल पेश कर रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आयेगी।

- - 0 - - 0 - - 0 - -

दोस्त बनकर आये हो तुम जबसे मेरे जीवन में
हर तरफ हैं पायी मैंने खुशीयाँ अपने जीवन में

ये हँसता हुवा चेहरा मेरा, तेरी ही तो देन हैं दोस्त
यही खयाल आया जब भी देखा मैंने दर्पन में

तोहफा हैं अनमोल ये सबसे दोस्ती तेरी मेरे लिये
जीवनभर युँही बंधे रहना दोस्ती के इस बंधन में

ऐ दोस्त तेरे साथ रहकर मिलता हैं युँ सुकून मुझे
माँ की गोद में सोता हैं जैसे बच्चा कोई बचपन में

खुद ही एक गजल बना हैं जीवन मेरा तुमसे मिलकर
करता हुँ हर शेर मैं इसका आज तुम्हारी अर्पन में


-योगेश ’अर्श’

22 जुलाई, 2009

वो मिलती हैं तसव्वूर में इस तरह...

दोस्तो,

प्यार में इंतजार का मजा कुछ और ही होता हैं। खास करके जब बहोत ज्यादा इंतजार के बाद मुलाकात होती हैं तब वो मुलाकात भी काफी रंग लाती है। कभी कभी तो ऐसा भी होता हैं की इंतजार ही इंतजार में आशिक अपनी मेह्बूबा से अपने ख्वाबों में ही मुलाकात कर बैठता हैं। लिजीये आपके सामने पेश कर रहा हूं एक ऐसा ही शेर जिसमें शायर उसकी मेहबूबा से अपने ख्वाबों में होती हुई मुलाकातों के सिलसिलों के बारे में, अपने दोस्तों से जिक्र कर रहा हैं। अर्ज किया हैं -

वो मिलती हैं तसव्वूर में इस तरह
जैसे रात में फूलों पे गिरती हैं शबनम
जैसे शमा से मिलते हैं मासूम परवाने
जैसे दिल की साज पे छेडे कोई सरगम

-योगेश 'अर्श'

18 जुलाई, 2009

आजमाईश

दोस्तो,
आज मैं आपके लिये एक ताजातरीन शेर लेकर आया हूं। इसे मैने अभी कुछ दिनों पहले ही लिखा हैं। उस दिन इस मौसम की पहली बारीश हो रही थी। ऐसे में दिल में कुछ पुरानी यादें ताजा हुई। कुछ सोये हुए दर्द, जिन्हें दिल ने बडी कोशीशोंके बाद भुला दिया था, वो फिर से जाग गये। ऐसेमें भला मेरे अंदर का शायर कैसे चूप रह सकता था!

अर्ज किया हैं-

ऐ बेरहम, तेरी बेवजह आजमाईश में
कही मर ना जाऊँ तुझको पाने की ख्वाहिश में
चंद बूँदो के लिये ना तरसा अपने ’अर्श’ को
तेरी मुहब्बत की मुसलसल सी बारीश में

इस शेर की खुबसूरती ये हैं की ये शेर अपने मेहबूब के लिये भी कहा जा सकता हैं और खुदा के लिये भी। गौर किजीयेगा- एक बंदा अपने खुदा से ये फर्याद कर रहा हैं की ऐ खुदा, मुझे पता हैं की तू मुझे इतना ग़म सिर्फ मुझे आजमाने के लिये ही दे रहा हैं। लेकिन तेरी ये आजमाईश सच कहू तो बेवजह ही हैं। क्यूंकी तू तो सबकुछ जानता हैं। तुझे ये भी मालूम हैं की मैं तेरी ही इबादत करता हूँ। वैसे तो तू अपने सभी बंदो से बहोत ज्यादा मुहब्बत करता हैं ये मुझे भी पता हैं। और तेरी मुहब्बत भी ऐसी हैं जैसे लगातार, बिना रुके गिरने वाली बारीश। फिर मुझे ही अपनी मुहब्बत के लिये इतना क्यूं तरसा रहा हैं? मुझपे अपनी रहम नजर कब करेगा मेरे खुदा? कही तेरी इस आजमाईश में एक दिन मेरी जान ही न चली जाएँ।

अब देखिये की अगर ये ही शेर अपने मेहबूब के लिये कहा जाये तो किन हालात में कहा जा सकता हैं। एक आशिक हैं जो अपनी मेहबूबा से दिलो-जान से मुहब्बत करता हैं। सिर्फ उसीको पाने की ख्वाहिश लिये वो जी रहा हैं। लेकिन उसकी मेहबूबा हैं की उसे अपने आशिक की चाहत पर यकीन नहीं हो रहा हैं। वो उसे हर तरह से आजमा रही है। इस तरह बार बार आजमाएँ जाने पर आशिक अपनी मेहबूबा से सवाल करता हैं की ऐ बेरहम, क्या तुझे मुझपे जरा भी रहम नहीं आता? इतना आजमाने पर भी अभी तक तुझे मेरी मुहब्बत पर यकीन क्यूं नही आता? तू मुझे चाहे कितना भी आजमा ले, लेकिन मेरी ये चाहत जरा भी कम नहीं होगी। लेकिन इस बात का भी खयाल रखना की तेरी इस बेवजह आजमाईश में कही मेरी जान ही न चली जाए। मैं जानता हूं की तू भी मुझसे उतनी ही मुहब्बत करती हैं। वर्ना इस तरह से मुझे बार बार ना आजमाती। अगर सच में तुझे मुझसे इतनी मुहब्बत हैं तो फिर अपनी मुहब्बत के लिये मुझे अब और ना तरसा।

-योगेश ’अर्श’

15 जुलाई, 2009

एक गज़ल हैं जैसे जिंदगी मेरी

दोस्तों,

आज जो शेर मैं आपके सामने पेश करने जा रहा हूँ वो मेरे अपने सबसे पसंदीदा शेरों में से एक हैं। जरा गौर फरमाईएगा...

एक गज़ल हैं जैसे जिंदगी मेरी
हर ग़म जैसे एक शेर
क्यूं ना खुबसूरत हो ये गज़ल
हर शेर में जीक्र तेरा जो हैं

इस शेर में शायर की कल्पना ये हैं की उसकी जो जिंदगी हैं उसमे कई सारे ग़म हैं। लेकिन उसे इन ग़मों के होने से जरा भी शिकायत नहीं हैं। उल्टा उसे इन ग़मों से प्यार ही हैं। और उसकी वजह ये हैं की उसका हर एक ग़म उस की मेहबूबा की ही देन हैं। उसका हर एक ग़म उसकी मेहबूबासे ही जुडा हुआ हैं। शायर की कल्पना की नजाकत देखिये। उसकी मेहबूबा ने उसका दिल तोड़ दिया है। वो अभी ग़मज़दा है। फिर भी उसे अपनी मेहबूबा से कोई शिकायत नहीं हैं। उसकी चाहत की ये हद हैं की उसकी मेहबूबा के दिए हुए ग़म से भी उसे प्यार ही हैं.

-योगेश 'अर्श'

10 जुलाई, 2009

दिल्लगी

दोस्तो,

प्यार में दो प्रेमीयों के बीच हँसी-मजाक तो चलता ही रहता हैं। फिर उसमे हल्कीसी छेडखानी, रुठना, मनाना सबकुछ होता हैं। सच पुछिये तो इन सब चीजोंसे प्यार की रंगत और बढती ही हैं। और गहराई भी। लेकिन कभी कभी ये दिल्लगी थोडी ज्यादा भी हो सकती हैं जिसकी वजह से मेहबूब की आँखोंमें अश्क भी छलक सकते हैं। अगर कभी ऐसा हो गया तो फिर पुछिये ही मत। अपने रुठे हुए मेहबूब को मनाते मनाते बेचारे आशिक का हाल बेहाल भी हो सकता हैं। आशिक ये समझ नहीं पाता की उसने जाने-अन्जाने में ऐसा क्या कह दिया जिसकी वजह से उसकी मेहबूबा की आँखों में आँसू भर आए। और वो उससे सवाल करता हैं...

पहले तो बेझिझक नजरें मिला ली
फिर क्यु शर्म से तुम्हारी आँखे झुक गई
हमने तो बस जरासी दिल्लगी की थी
फिर क्यु अश्कों से तुम्हारी आँखे भर गयी

-योगेश 'अर्श'

दोस्तो, आपको मेरा ये शेर कैसा लगा ये निचे कॉमेंटमें जरुर लिखीयेगा। आपकी टीका-टिपण्णी का स्वागत ही होगा।